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  जनी शिकार प्रथा यह मुक्का सेंदरा क्या है ? यह कहां से आरंभ हुआ था? 

    
https://www.mekostudy.com/2020/10/what-is-zany-poaching-or-punching-where-did-it-begin-history%20-of-zany-shikar-hunting.html



साधारण शब्दों में महिलाओं द्वारा प्रारम्भ किए गए जनीशिकार की परम्परा का उद्देश्य कुँडुख समाज में पुरूषों को युद्ध के प्रति जागरूक करना और सामाजिक दायित्व के लिए सचेत करना था , साथ ही महिलाओं की सामाजिक भूमिका को भी उजागर करना था । इस महान ऐतिहासिक घटना की पुनरावृति प्रत्येक बारह वर्ष में होती है । 

कुँडुख महिलाओं द्वारा रोहतासगढ़ में आरम्भ किया गया जनीशिकार की परम्परा का इस समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा । इस परम्परा ने संभवतः महिलाओं की युद्धक प्रवृति को उजागर किया , इसे महिलाओं की महान उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है ।


जनी शिकार क्यों मनाया जाता है? जनी शिकार का इतिहास क्या है? 

जनीशिकार के विषय में आमलोगों की धारणा गलत हैं तथा अज्ञानता से परिपूर्ण होती है । ऐसे लोग इसकी महत्ता को समझ नहीं पाते हैं । इस प्रकार के विचार रखने वालों का मानना है कि रोहतासगढ़ में कुँडुख महिलाओं द्वारा मुगल सेना को युद्ध में परास्त किया गया था जिसकी याद में प्रत्येक बारह बछर में कुँडुख महिलाएँ जनीशिकार पर जाती हैं , ऐसा कहे जाने का कोई आधार नहीं है । 




पहली बात तो यह है कि छठी शताब्दी ई 0 पू 0 में इस सृष्टि में इस्लाम का कोई अस्तित्व ही नहीं था , इसलिए मुगल सेना के साथ युद्ध किए जाने की बात मिथ्या है । यदि कुँडुख महिलाएं किसी भी युद्ध में विजयी हुई थी तो भी बारह वर्ष के काल गणना का आधार क्या है ? यह भी विचार करने की बात है कि गांव में शिकार के लिए जाने का क्या औचित्य है ? जिन महिलाओं ने परवर्ती काल में युद्ध में बढ़ चढ़कर हिस्सा ली थी और दुश्मनों को मार भगाया था उन्हीं महिलाओं की पूर्वज गांव में शिकार के लिए गई आखिर क्यों ? कुँडुख महिलाएं कतई बुजदिल नहीं थी जिस कारण वे गांव में शिकार के लिए गई थी । जब कि उस काल की महिलाओं की कौन कहे आज भी कुँडुख महिलाएं बुलंद हौसलेवाली होती है । 

उस काल की एक अकेली कुँडुख महिला शेर को पछाड़ सकती थी तब भला ऐसी साहसी महिलाओं को शिकार पर जाना ही था तो जंगल में जाती , उन्हें गांव में जाकर लोगों के पालतू जानवरों की हत्या करने की क्या आवश्यकता थी । वैसे भी उस काल की महिलाएं किसी के अहित की बात सोच भी नहीं सकती थी । इसलिए जब तक उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर प्राप्त नहीं होते हैं तब तक जनीशिकार की परम्परा की स्थिति के औचित्य को सिद्ध नहीं किया जा सकता है ।


कुँडखर का प्राचीन इतिहास ( 2005 , जीतू उरांव ) में लिखा है कि अभी तक कुँडुख महिलाएं लगभग 215 बार जनीशिकार पर जा चुकी हैं और अगली बार ( 2005-2006 ) 216 वीं बार जनीशिकार पर निकलेंगी , यानि अब तक जनीशिकार की संख्या 216 हो चुकी है , और अगली बार ( 2017-2018 ) में 217 वीं बार जायेंगी । अब हम सबसे पहले कुँडुख महिलाओं से संबंधित युद्ध की चर्चा करेंगे । 

किन युद्धों में कुंडुख महिलाएं विजयी हुई थी? 
जिसका संबंन्ध जनीशिकार से जुड़ा हुआ है , बल्कि यह बारह बछर से जुड़ा हुआ है न कि किसी युद्ध से । रोहतासगढ़ की स्थापना के बाद 492 ई 0 पू 0 तक कुँडखर द्वारा कोई भी युद्ध नहीं लड़ा गया था । इसलिए यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि कुंडुख की परम्परा अस्तित्व में आई । 

जहां तक युद्ध में विजयी होने का प्रश्न है तो रोहतासगढ़ की स्थापना के 108 वर्ष बाद ( 492-460 ई 0 पू 0 तक ) दो लड़ाईयाँ लड़ी गई थी और दोनों ही युद्ध में कुँडखर विजयी हुए थे । तीसरा और अंतिम युद्ध ई0 पू0 185 के बाद लड़ा गया था जिसमें कुँडखर को पराजय के साथ ही रोहतासगढ़ से विस्थापन का सामना करना पड़ा । 

प्रथम दो युद्धों के विषय में रामशरण शर्मा ने अपनी पुस्तक " प्राचीन भारत ' में लिखा है कि " मगध शासक अजातशत्रु ( 492-460 ई 0 पू 0 ) ने सिंहासन पर बैठते ही दो लड़ाईयां लड़ी और तीसरी के लिए तैयारियां की थी । 
उपरोक्त कथन पर गहन चर्चा करने की जरूरत है , क्योंकि अजातशत्रु को उनके पित के पिता " बिम्बिसार ने अंग देश पर अधिकार कर लिया और इसका शासन करना , नहीं दे अपने पुत्र अजातशत्रु को सौंप दिया ।


बिंबिसार ने अपने वैवाहिक संबधों से भी अपनी स्थिति को मजबूत किया । उसने तीन विवाह किए । उसकी प्रथम पत्नी कोशलराज की पुत्री और प्रसेनजीत की बहन थी । उसके साथ दहेज में प्राप्त काशीग्राम से उसे एक लाख की आय होती थी । उसकी दूसरी पत्नी वैशाली का कलंक अप की लिच्छवी राजकुमारी चेल्लणा थी जिसने अजातशत्रु को जन्म दिया और तीसरी रानी पंजाब के मद्रकुल के प्रधान की पुत्री क्षेमा थी । विभिन्न राजकुलों उपहार में दी से वैवाहिक संबंधों के कारण बिम्बिसार को बड़ी राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली और करना , ये बातें पश्चिम की ओर फैलाने का मार्ग प्रशस्त हो गया ।

अजातशत्रु का प्रतिद्वन्दी की राजनीतिक अवन्ति का शासक अधिक शक्तिशाली था । अवन्ति के राजाओं ने कौशाम्बी के अपने ही घरों वत्सों को हराया और अब वे मगध पर हमला करने की धमकी दे रहे थे , इसी भयंकर संघर्षर खतरे का सामना करने के लिए अजातशत्रु ने राजगीर की किलेबन्दी की थी । परन्तु अजातशत्रु के जीवनकाल में अवन्ति को मगध पर आक्रमण करने का चण्डप्रद्योत था अवसर नहीं मिला " ।


( प्राचीन भारत - रामशरण शर्मा ) प्राचीन भारत में मगध का उदय के अंतर्गत मक्खन लाल ने लिखा है कि " अजातशत्रु और प्रसेन्नजित भी ऐसा प्रतीत के बीच एक भयंकर संघर्ष चलता रहा और हॉलाकि काफी समय तक इसका तरफ रहा होगा कोई परिणाम नहीं निकला । जब अजातशत्रु लिच्छवियों के साथ लड़ रहा था उसने पाटलीग्राम में जो गंगा और सोन नदी के संगम पर बसा था प्रतिरक्षा के लिए एक दुर्ग बनवाया था"। 

जैसा कि मगध शासक बिम्बिसार ने अपने वैवाहिक संबंधों के आधार पर राज्य विस्तार के साथ ही मद्र , कोशल तथा वैशाली के साथ मित्रता कायम करने में सफलता पाई , उससे मगध साम्राज्य की सीमा पूरब में अंग तथा पश्चिम में काशी तक फैल गई । उसका शासन काल ई• पू•544 से ई•पू• 491 तक था । उसने 54 वर्षों तक शासन किया । 

बिम्बिसार के बाद राजगद्दी के लिए उसके पुत्रों में संघर्ष हुआ अथवा नहीं , परन्तु एक ऐसा विश्वास चला आ रहा है कि अजातशत्रु ने अपने पिता की हत्या कर बलपूर्वक सिंहासन पर अधिकार कर लिया । लिच्छवी राजकुमारी चेल्लणा के पुत्रों हल्ल तथा बेहल्ल को उनके पिता द्वारा दी गई उपहार हाथी तथा माला की अजातशत्रु द्वारा मांग बने वैवाहिक संबधों से में करना , नहीं देने पर आक्रमण करना आदि " ( प्राचीन भारत का राजनीतिक एवंसांस्कृतिक इतिहास - राधाकृष्ण चौधरी ) ।

यहाँ सबसे पहली बात तो यह है कि अजातशत्रु जैसे शक्तिशाली शासक सकी दूसरी पत्नी देशाने अपने वयोवृद्ध और जीवन के अन्तिम पायदान पर कदम रखे पिता की हत्या का कलंक अपने माथे पर क्यों लेने लगा और अपने भाईयों को पिता द्वारा उपहार में दी गई हाथी तथा माला की मांग करना और नहीं देने पर आक्रमण करना , ये बातें कहीं से भी उचित नहीं जान पड़ती है । वैसे भी उसके भाईयों की राजनीतिक स्थिति की कोई जानकारी नहीं मिलती है और कोई भी व्यक्ति अपने ही घरों में दुश्मन खड़ा करना नहीं चाहेगा और लिच्छवियों के साथ भयंकर संघर्षरत होने का कारण भी स्पष्ट नहीं है । 

अतः अजातशत्रु के शासन के आरम्भिक काल में उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वन्दी अवन्ति के शासक चण्डप्रद्योत था जिसने मगध पर आक्रमण करने की धमकी दे रखी थी इससे भी ऐसा प्रतीत होता है कि अजातशत्रु का सारा ध्यान अवन्ति के शासक की तरफ रहा होगा और उससे निपटने के उपायों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखा होगा । अतः रामशरण शर्मा के कथन के साथ ही डॉ सत्यनारायण दूबे द्वारा यूनीफाईड इतिहास में वर्णित ' अवन्ति में बुद्ध के समय में चण्ड प्रद्योत शासन करता था । कहा जाता है कि एक बार उसने मगध पर आक्रमण करने योजना बनाई थी जिससे भाई भी तो करो जा सतरंगी राजगृह की किलेबंदी की थी। अवंती ही एक ऐसा राज्य बच गया था जो मगध का सामना कर सकता था। "

" अतः यह कहना ज्यादा उपयुक्त प्रतीत होता है कि जनीशिकार की रोहतासगढ़ की स्थापना के 108 वर्ष बाद ई 0 पू 0 492-460 के मध्य मगध इतिहास लेखन की परम्परा का आरम्भ हो चुका था , फिर भी इन युद्धों का विवरण न देकर इस बात को छिपा दिया गया कि आखिर अजातशत्रु के सत्तारूढ़ होते ही दो युद्ध किसके साथ लड़ा गया था और तीसरे युद्ध की तैयारी क्यों की गई थी । इन दो युद्धों में विजयी सेना किसकी थी ? वास्तविकता यही है कि मगध शासक अजातशत्रु की सेना को पराजित करने वाले लोग कोई और नहीं थे बल्कि स्वयं रोहतासगढ़ की कुँडुख महिलाएं थी और महिलाओं द्वारा पराजित सेना का क्या हश्र हो सकता है बतलाने की जरूरत नहीं है । संभवतः इन्हीं कारणों से इन दो युद्धों का उल्लेख किया जाना इतिहासकारों की दृष्टि में जरूरी नहीं था । उपरोक्त दोनों युद्धों की पृष्ठभूमि कैसे तैयार हुई इस पर संक्षिप्त चर्चा आवश्यक प्रतीत होता है ।

जिस प्रकार " अवन्ति में बुद्ध के समय में चण्डप्रद्योत राज्य करता था । कहा जाता हान उपलब्धि क है कि एक बार मगध पर आक्रमण करने की योजना बनाई थी , जिससे भयभीत प्रतीक स्वरूप अप होकर अजातशत्रु ने राजगृह की किलेबन्दी की थी ( यूनीफाइड इतिहास - डॉ प्रतीक स्वरूप सत्यनारायण दूबे ) तथा " अवन्ति एक ऐसा राज्य बच गया था , जो मगध का सामना कर सकता था । प्रद्योत के आक्रमण की आशंका से तीसरा और अजाताशत्रु ने अपनी राजधानी की किले बन्दी की थी " ( प्राचीन भारत का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास - राधाकृष्ण चौधरी ) । 

लेखकद्वय के उपरोक्त कथन से स्पष्ट है कि सुदूर पश्चिम में अवन्ति के शासक चण्ड प्रद्योत द्वारा मगध साम्राज्य पर आक्रमण किये जाने की योजना का पता चलने से मगध सम्राट अजातशत्रु निश्चय ही विचलित हुए होंगे और अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए किलेबन्दी की ओर ध्यान देना आरम्भ किया । इस क्रम में अवन्ति और मगध साम्राज्य के मार्ग में रोहतासगढ़ के कुँडखर का किला था , जिस पर मगध साम्राज्य के सेना की नजर अवश्य थी जो निश्चय ही अवन्ति के आक्रमणकारी सेना के मार्ग में अवरोधक की तरह काम करता ।



इस विचार से उत्साहित मगध साम्राज्य की सेना ने रोहतासगढ़ को हस्तगत करने के लिए आक्रमण कर दिया , लेकिन रोहतासगढ़ की कुँडुख महिलाओं की सजगता के कारण मगध साम्राज्य की सेना परिजित होगर भाग खड़ी हुई । संभवतः रोहतासगढ़ की कुंडुख महिलाओं से पराजित मगध साम्राज्य की सेना बौखलाई हुई दूसरी बार आक्रमण करने की योजना बनाई और पिछले अपमान का बदला लेने के लिए पुनः रोहतासगढ़ पर आक्रमण कर दिया । परन्तु इस बार भी रोहतासगढ़ की कुँडुख महिलाओं और युवतियों ने दुगुने उत्साह के साथ आक्रमणकारी सेना का मुकाबला किया और पराजित कर मार भगाया । 

दूसरे युद्ध में भी पराजित मगध साम्राज्य की सेना ने तीसरे युद्ध की तैयारी कर चुकी थी , परन्तु किन्हीं कारण वश रोहतासगढ़ के कुँडखर के साथ तीसरा युद्ध नहीं हुआ । इसका कारण शायद अवन्ति के शासक चण्डप्रद्योत का भय जाता रहा हो । उपरोक्त दोनो युद्धों में विजयी कुँडुख महिलाओं और युवतियों की इस महान उपलब्धि को हमेशा के लिए यादगार बनाने हेतु प्रथम युद्ध में विजय के प्रतीक स्वरूप अपने कपाल में एक गोदना गोदवाई और दूसरे युद्ध में विजय के प्रतीक स्वरूप दोनों कनपटी में एक - एक गोदना गोदवाई । तीसरा और अन्तिम युद्ध 185 ई 0 पू 0 के बाद लड़ा गया था जिसमें पराजय के साथ विस्थापन का सामना करना पड़ा ।

इस युद्ध में पराजय को स्वीकारते हुए कुँडुख महिलाओं ने अपनी टुढ़ी के उपर एक छोटा सा गोदना गोदवाई । अतः जनी शिकार की परम्परा का किसी युद्ध के साथ कोई संबंध नहीं रहा है , बल्कि यह रोहतासगढ़ की स्थापना के साथ ' बारह बछर ' की घटना से जुड़ा विशुद्ध रूप से एक ऐतिहासिक घटना है । 

हम यह जानते हैं कि--
रोहतासगढ़ की स्थापना काल से ही कुँडुख समाज में कई अप्रत्याशित और विस्मयकारी घटनाएं जन्म लेती रही हैं . जैसे बलिप्रथा का प्रारम्भ , पूजा स्थलों का गांव के बाहर स्थापना , जातीय विभाजन आदि । इसके बाद भी कुँडुख पुरूषों में सामाजिक समस्याओं के प्रति घोर उदासीनता महिलाओं के लिए असह्य होती जा रही थी । इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए महिलाओं का चिन्तित होना स्वभाविक था । उन्हें लग रहा था कि इतना कुछ त्याग और बलिदान के बाद भी पुरूषों का स्वाभिमान सोया पड़ा है तब महिलाओं ने एक योजना के अंतर्गत पारम्परिक तथा चरणबद्ध तरीके से पुरुषों के वेश में पारम्परिक हथियारों से सुसज्जित होकर पुरूषों के खोये स्वाभिमान को जगाने और युद्ध तथा सामाजिक दायित्व के प्रति जागरूक करने के लिए गांव गांव में भ्रमण करने लगी जिसे जनीशिकार का नाम दिया गया , जिसमें पालतू पशुओं की हत्या के लिए कोई स्थान नहीं था ।

इस महान परम्परा को अक्षुण्ण , मर्यादित तथा अनुशासित बनाए रखने के लिए कुछ नियम कायदे बनाए गए जिसका सख्ती के साथ पालन किया जाता है --

"जनी शिकार के नियम"

( क ) किसी भी गांव से जनीशिकार जाने के पूर्व किसी अन्य गांव से जनीशिकार समूह का आना जरूरी है , तभी उस गांव की महिलाएं मजबूती प्रदान युवतियां दूसरी दिशा में जनीशिकार पर जायेंगी ।
 ( ख ) जनीशिकार पर जाने के पहले गांव में मुनादी करायी जाती है जिससे इसीलिए महि भगाया । यह एक कुत्सित कुछ क्षेत्र प्रायोजित होत मेहमान नवाज है कि कुँडुख गांव की सभी महिलाओं / युवतियों को सूचना प्राप्त होती है । 

( ग ) जनीशिकार पर जाने के लिए प्राचीन काल से सुनिश्चित गांव हैं उसी गांव में जनीशिकार जायेंगी , जाने के एक दिन पूर्व उस गांव के महतो , पाहन , पाईनभोरा को सूचना पहुंचा दी जाती है ।

( घ ) किसी गांव से जनीशिकार पर आगमन की सूचना पूरे गांव को दे दी जाती है ताकि वे अपने पालतू पशुओं को घर में बन्द कर रखें । 
( ङ ) जनीशिकार पर जाने के पूर्व पूरे गांव की महिलाएं युवतियां अखड़ा में इकट्ठा होती है जिन्हें पाहन विधिवत पूजा कर प्रस्थान करने की आज्ञा 

( च ) जिस गांव में जनीशिकार समूह जाती है तो वह सबसे पहले उस गाँव के अखड़ा में जमा होती है , जहां उस गांव के महतो , पाहन , पाइनभोरा के साथ समूचे गांव के लोग पारम्परिक तरीके से उनका स्वागत करते हैं अखड़ा में नाच गान होता है । 

( छ ) पारम्परिक नाच गान के पश्चात् जनीशिकार समूह को गांव भ्रमण की आज्ञा दी जाती है ।

( ज ) गाँव भ्रमण के पश्चात् जनीशिकार समूह पुनः अखड़ा में जमा होती है और सायंकाल के पूर्व गांव की ओर से उपहार आदि देकर बिदा कर दिया जाता है ?

कुछ क्षेत्र में दूरस्थ गाँवों में जनीशिकार जाने की परम्परा है जो पूर्व प्रायोजित होती है जहां रात दिन का सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है और मेहमान नवाजी की जाती है । 

इस कार्यक्रम के दौरान सामाजिक रिश्ते को मजबूती प्रदान करने के लिए संगी सहिया जैसे पवित्र रिश्तों से आपस में जुड़ते हैं । इस पवित्र सामाजिक परम्परा के विषय में भ्रामक प्रचार किया जाता है कि कुँडुख पुरूष सरहुल पर्व के अवसर पर शराब के नशे में धुत पड़े थे , इसीलिए महिलाएं पुरूषों के वेश में युद्ध में शामिल होकर दुश्मनों को मार भगाया । 

यह कथन अतिश्योक्तिपूर्ण तो है ही पूर्वाग्रह से ग्रसित दुःप्रसार का एक कुत्सित प्रयास भी है । इस प्रकार के अफवाह उड़ाने वालों की मंशा चाहे जो भी रही हो परन्तु कुँडुख पुरूषों के स्वाभिमान और मनोबल को तोड़ने का कुत्सित प्रयास ही तो है । इस बात पर कतई विश्वास नहीं किया जा सकता है कि युवक , किशोर , अधेड़ , बुजुर्ग सभी नशे में धुत रहे होंगे । यदि 2500-2600 वर्ष पूर्व कुँडुखर की नशे की ऐसी स्थिति रही हो तो कुँडुख समाज आज तक जीवित कैसे बच पाया ? देश आजाद हुआ और पिछले 30 सालों में नशाखोरी ने आदिवासियों का जितना अहित किया वह हैरतअंगेज है । ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है । 

30-35 वर्ष पूर्व हमने अपने पिता दादा जनों को देखा था । पर्व त्योहार में भी ये ग्रा अपने दैनिक कृषि कार्यों को निपटाने के पश्चात् ही मेहमानों के आगमन पर बैठकर खाते पीते थे , उनके पूर्वजों के बारे में इस प्रकार के घटिया आरोप लगाना अनुचित है । दूसरी ओर आक्रमणकारियों के आने के बाद महिलाओं के पास पुरूष वेशभूषा धारण करने के लिए वक्त ही कहां रहा होगा । 

जनी शिकार के आयोजन के पीछे मानव जीवन का सुरक्षा सबसे बड़ा कारण रहा होगा. उस वक्त ज्यादातर गांव जंगलों के सीमावर्ती जिला में अवस्थित रहा करता था . जब जंगली जानवरों की संख्या बढ़ जाती होगी तो लोग उसे हर 10 साल के अंतराल यह 12 साल के अंतराल में शिकार करते होंगे, ताकि इंसान का जीवन सुरक्षित रहे और संतुलन बना रहे. लेकिन अब न तो जंगल रहे और न हीं वन्य प्राणी. ऐसे में इस तरह के शिकार से निरीह पशु -पक्षी निशाना बन जाते हैं। 

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