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जतरा क्या है? जतरा में क्या होता हैं? What is the jatra?What happens in the zatra? 👍👍


जतरा टाँड 


Jatara is very popular in Oraon society (kudhukh society). Jatara is the place where people meet together on the occasion of a festival.

सरना धर्मगुरु के अनुसार जतरा आदिवासियों का शक्ति पीठ है। 

जतरा, उराँव समाज में बहुत ही लोकप्रिय है। जतरा वह स्थान होता है जहां लोग किसी पर्व -त्यौहार के अवसर पर एक साथ मिलते है। साधारण अर्थों में जतरा सांस्कृतिक अवसरों में मिलने जुलने का केंद्र होता है। जतरा में उराँव समाज की संस्कृति एवं नाच - गान का प्रदर्शन होता है ।

 जतरे में पड़हाओं के गाँवों को अपने - अपने आबंटित चिन्हों के साथ आना है । जतरे में रंगा - रंग सामूहिक नृत्यों का आयोजन रहता है । इन नृत्य मेलों को देखने के लिए दूर - दराज के लोग पहुँच जाते हैं । मेलों में नाना प्रकार के नृत्य होते हैं । 

लोग घूम - घूमकर मेले में नृत्य का आनन्द लेते हैं । वे अपने - अपने सगे - संबंधियों से भी मिलते - जुलते और दुःख - सुख की जानकारी लेते हैं । जतरे को नृत्य और मिलने - जुलने का अड्डा भी कहा जा सकता है । 


जतरा में लोग क्या- क्या करते हैं? और जतरा में क्या-क्या होता है?

जतरा में दूर-दूर से लोग एक जगह संगठित होता है तथा दूर - दूर से आये लोग अपने संबंधियों के पास मेहमान के रूप में जाते हैं तथा रह जाते हैं । 

मेलों के बहाने मिलने - जुलने और मेहमान जाने का सुअवसर होता है । जतरा टाँड में जतरा प्रकृति देवी होते हैं ।


इस  के प्रतीक में लकड़ी का एक मोटा और ऊँचा खूटा रहता है । प्रकृति देवी की पूजा के पहले खूटे को धोकर चावल की गुंडियों से रंग देते हैं ।

कहीं - कहीं सफेद मिट्टी का लेप रहता है खूटे में माला पहनाने का भी प्रचलन है । जतरे के उत्साह पूर्वक और मंगलमय रुप से सम्पन्न होने के लिए एक दिन पूर्व या रात में पहान और प्रकृति देवी के लिए  
इस पूजन में सफ़ेद एवं काला मुर्ग़ा की बलि भी चढ़ाई जाती है तथा बलि देकर पूजा अर्चना करते हैं । 


वे प्रकृति मां (अधिष्ठात्री शक्ति) से अराधना करते हैं कि जतरा सुन्दर और शान्तिमय ढंग से गुजर जाय । किसी प्रकार की लड़ाई - झगड़ा और अशान्ति न हो ।

युवक - युवतियाँ आनन्दपूर्वक नाच - गान करते रहें । कहीं - कहीं जतरे में लम्बे बाँस भी गाड़ी जाती हैं । यह प्रकृति मां  (अधिष्ठात्री शक्ति )की महिमा और ज्योति का चिन्ह है । 


जतरा  स्थल पर पाहन पारम्परिक रूप से सरगुजा के फूल सहित अन्य पूजन सामग्रियों के साथ देवताओं का आहवाहन करते हुए ‘जतरा खूँटा’ का पूजन करता है। 

बांस के ऊपरी छोर में पिंजरा बाँधकर दीप जला दिया जाता है । दीप की ज्योति जतरे के लिए रक्षक एवं शुभ चिंतक के रुप में रहते हैं । इस दिन सरना धर्मगुरु के अगुवाई में अधिष्ठात्री शक्ति के प्रतीक जतरा   डांग (खूंटे ) परिक्रमा व जतरा खूंटा की पूजा-अर्चना भी की जाती है।
इस डांग को उराँव में ' पिंजरा डांग ' कहते हैं ।

जेठ जतरा के संबंध में एक गीत इस प्रकार है -


पिंजिरा का दिया , निझि गेला भरांडो डांड़े ।

ले चलु तुको - दिघिया ,

 पिंजरा का दीया , 

निझि गेला भरांडो डांड़े ।



अर्थ- इस गाने में कहा गया है कि पिंजिरा डांग का दीप बुझ गया है । यह अशुभ लक्षण है । इसे अपने गाँव तुको - दिघिया वापस कर दिया जाया कोई अप्रिय घटना हो सकती है।बाँस के पिंजरा का दीप और उसकी ज्योति खुशी और शुभ का लक्षण है ।



बरसात खत्म होते ही इनके खुशी का ठिकाना नहीं रहता । ये किसी न किसी बहाने पर्व - त्योहार और जतरे का आयोजन करते है।

करमा , जितिया , दशहरा , फागुन , सराहुल और जेठ जतराओं का तांता लगा रहता है । बरसात समाप्त होने पर ये आनन्द - विभोर हो नगाड़ा , ढोलक , झाँडा और मांदर गले में टांग कर खुशी के मारे थिरक उठते हैं ।

चारों ओर के सुनसान और शान्त वातावरण में मांदर की मधुर आवाज भावुक दिल वालों के हृदय को स्पर्श कर मन को आनन्द से मर देती है ।

अब ये इस खुशियाली को अपने मन और घर तक ही सीमित न रखकर इसे मैदानों में उतार देते हैं । इस उमंग को नाच - गान के द्वारा अखाडों और जतरा टांडों में प्रदर्शन करने से चूकते नही ।

बरसात को छोड़ किसी न किसी बहाने त्योहारों और देवी - देवताओं की पूजा के अवसर पर जतराओं का आयोजन किये हुए है ।


लोग इन्हीं जतराओं में नृत्य देखने के बहाने अपने अपने संबंधियों से मिलते - जुलते हैं क्योंकि पुराने जमाने में डाक - तार की यवस्था नहीं थी । लोग इन्हीं जतराओं में आकर संबंधियों का हाल - समाचार और सुख - दुःख का पता कर लेते थे ।


जत्रा (जतरा ) का क्या महत्व क्या है?

जैसा कि अब तक आपने जतरा के बारे में जाना है जिसमें जतराये पर्व - त्योहारों और पूजा - पाठों के अवसरों पर लगाया करते हैं ।
जतराओं का अयोजन पड़ाहाओ के निर्णायानुसार होते हैं , किसी पड़हा में एक तो किसी में दो या उसे भी अधिक जतरा लगाये जाते हैं । जत्रा का महत्व प्रकृति के अनुकूूल होता हैं। 

 

जतरा स्थल आदिवासी व  मुंडा समाज का मिलन स्थल भी है।  जतरा स्थल में अन्य  आदिवासी समाज के लोग भी आ सकते आते हैं तथा सुख-समृद्धि व शांति के लिए प्रार्थना कर सकते  हैं।



जिस मौसम में जतरा लगते हैं उसी मौसम का नाच और गान रहता है । स्वर भी उसी मौसम के होते हैं । मौसम के आधार और वातावरण के अनुकूल ही गानों और स्वर की रचना की गई है ।

बाजों के धुन ( लय ) गानों के आधार पर ही होते हैं । दूसरे मौसम का गाना और बजाना शोभा नहीं देता है । इसीलिए पूर्वजों ने अपने - अपने मौसम के गाने , बजाने और नाचने पर जोर देकर व्यवहार करने की सलाह दी है । जत्रा प्राकृतिक प्रेम का भी सूचक होता इसके की प्रकृति को आदर सम्मान देते है।

पूर्वजों ने सजा के रुप में कहा है कि मौसम के गानों को नहीं गाने से प्रकृति उन्हें सजा देती है क्योंकि इससे मौसम का अनादर होता है । समाज के लोगों का विश्वास है कि ऐसे असामयिक गाना को गाने वालों के चूतडों में फोड़े होते हैं । पूर्व में बतलाये गये हैं कि जतरा बरसात को छोड़कर सालों भर लगते हैं । ये सभी पडहाओ में लगाये जाते हैं । 

सभी का एक - एक करके वर्णन करना सम्भव नहीं है । इसलिए सर्द ऋतु में झारखंड की पृष्ठभूमि में लगने वाले एक मशहूर जतरा (मेला) मुड़मा जतरा (मेला )और ग्रीष्म ऋतु के पड़हा जतरा बेड़ो जतरा (मेला ) का ही वर्णन किया जा रहा है । ये दोनों ही जतरे उरांव संस्कृति के गढ़ वाले क्षेत्र में है। 

उरांव क्षेत्र का पहला जत्रा कौन सा है?
समूचे उरांव क्षेत्र के गढ़ में लगने वाला प्रथम जतरा इसकीस (21) पड़हा के अन्दर तुको - दिधिया है । यह जतरा बैसाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवी तिथि में लगता है ।

इसके बाद ही अन्य क्षेत्रों के जतरे लगते हैं । यह तिथि राजी पड़हा की बैठक में निश्चित किया गया है । इस प्रकार एक एक करके पूरे महीने भर जतरा लगाये जाते हैं ।

अन्तिम जेठ जतरा इसी इक्कीस पड़हा के अन्दर ग्राम कुदारखो में लगता है । इस प्रकार जेठ जतरा का आरम्भ और अन्त इसी इक्कीस पड़हा तुको दिधिया और कुदारखो में होता है । इसके बाद बरसात के मौसम के आने की उम्मीद रहती है । छिट - पुट वर्षा भी होने लगती है । सभी का ध्यान खेती वारी की ओर चला जाता है ।

आषाढ़ , सावन और भादो अर्थात बरसात के समय ये गाँव ही में रहकर गाँव को आनन्दमय बनाने के लिए रात में युवक - युवतियों अखाड़े में नृत्य करती है छोटी जत्रा कि संज्ञा देकर , समाज में उमंग उल्लास का वातावरण बनाए रखते हैं साथ ही मानसिक रूप से चंचलता की कुशल अनुभूति का एहसास कराते है। 

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